'आसिफा' अब तुम इस जहां में फिर दुबारा ना आना, जब तक हैवानों का मिट न जाये दुनिया से ठौर-ठिकाना। ये ऊपर लिखी दो पंक्तियाँ तो बस शुरुआत है। मेरे दिल की पूरी व्यथा अब नीचे पढ़िए। ********************** समाज के ठेकेदार हो तुम, सामाजिकता के पर्याय हो तुम। समाज की रक्षा करने वाले, समाज के ही तो भक्षक हो तुम। हमारी हिफाज़त करने की तुमने, कसमें बड़ी सारी खाई थी। हमारी तरक्की की ज़िम्मेदारी, तुमने अपने कांधों पे उठायी थी। बहुत खूब तुमने अपना फर्ज़, बड़ी बखूबी से निभाया है। अपने घर की बेटी को ही, तुमने बेदर्दी से मार गिराया है। पुछोगे तुम ये क्या कहा मैनें, तुम कुछ समझ नहीं पाये हो। अपनी अकल को जो तुम, अपने लिंग में छोड़ आये हो। माना तुम्हारा उससे ना कोई, रिश्ता था, ना कोई नाता था। पर उसकी इज़्ज़त बचाने को, तुम्हारे बाप का क्या जाता था। धर्म की स्थली को तुमने आज, अपने कर्मों से नापाक किया है। जहाँ माँ की पूजा होती है, वहीं, एक बेटी का बलात्कार किया है। पापी, तूने ये क्या काम किया है। इंसानियत को शर्मसार किया है। उस पाक बच्ची की रूह पे तूने, अनगिनत अत्...