'आसिफा' अब तुम इस जहां में फिर दुबारा ना आना,
जब तक हैवानों का मिट न जाये दुनिया से ठौर-ठिकाना।



ये ऊपर लिखी दो पंक्तियाँ तो बस शुरुआत है।
मेरे दिल की पूरी व्यथा अब नीचे पढ़िए।

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समाज के ठेकेदार हो तुम,
सामाजिकता के पर्याय हो तुम।
समाज की रक्षा करने वाले,
समाज के ही तो भक्षक हो तुम।

हमारी हिफाज़त करने की तुमने,
कसमें बड़ी सारी खाई थी।
हमारी तरक्की की ज़िम्मेदारी,
तुमने अपने कांधों पे उठायी थी।

बहुत खूब तुमने अपना फर्ज़,
बड़ी बखूबी से निभाया है।
अपने घर की बेटी को ही,
तुमने बेदर्दी से मार गिराया है।

पुछोगे तुम ये क्या कहा मैनें,
तुम कुछ समझ नहीं पाये हो।
अपनी अकल को जो तुम,
अपने लिंग में छोड़ आये हो।

माना तुम्हारा उससे ना कोई,
रिश्ता था, ना कोई नाता था।
पर उसकी इज़्ज़त बचाने को,
तुम्हारे बाप का क्या जाता था।

धर्म की स्थली को तुमने आज,
अपने कर्मों से नापाक किया है।
जहाँ माँ की पूजा होती है, वहीं,
एक बेटी का बलात्कार किया है।

पापी, तूने ये क्या काम किया है।
इंसानियत को शर्मसार किया है।
उस पाक बच्ची की रूह पे तूने,
अनगिनत अत्याचार किया है।

मन तो करता है तुझे खुद, मैं,
हाथियों से भी कुचलवा डालूँ।
तेरी एक-एक साबूत हड्डी को मैं,
काले कुत्तों से भी नुचवाँ डालूँ।

तुझे ऐसी ज़िंदगी जीने दे 'खुदा',
जो मौत, से भी बदतर हो जाए।
तेरे हाथ पाँव और लिंग कटवा,
तुझे नपुंसक बना छोड़ा जाए।

अब मैं एक बात कहता हूँ सुनो,
तुम से कोई नहीं नपुंसक बड़ा।
जो एक फूल सी बच्ची को भी,
तुम्हारी हवस ने नहीं है छोड़ा।

क्या तुम्हे शर्म नहीं आती है,
या तुमने सारी बेच खाई है।
तुम्हारे माँ-बाप ने तुम्हे क्या,
औरत की इज़्ज़त करनी है,
ये बात तुम्हें नहीं बताई है।

क्या चाहते हो तुम ही बताओ,
क्या लड़कियाँ अब इस जहां में,
पैदा होनी, अब बंद ही हो जाये।
या तुम जैसे हैवानों को मारना,
हर घर की बेटी ही सीख जायें।

तुम तो नहीं सुधरोगे ये तुमने,
कसम जो इतनी ढीठ खा ली है।
उम्र की हर दह्लीज़ पे तुमने,
उसके चोट अब कर डाली है।

आलम अब कुछ, ऐसा है कि,
लड़की उमर से पहले ही अब,
बड़ी और समझदार हो जाती है।
तुम्हारे हैवानियत और कमीनेपन,
की वो, शिकार जो बन जाती है।

जिस माँ को मंदिरों, त्योहारों में,
तुम बुलाया, पूजा किया करते हो।
उनके अंश पे ही अपने हवस की,
आग उड़ेलते हुए नहीं डरते हो?

ये हिन्दुत्ववाद की तुम हमें,
जो दुहाई दिया करते हो ना।
असल में तुम ही हो सालो,
हिन्दुत्व पे सबसे कलंक बड़े।

माँ-बेटी की रक्षा करना हर,
हिंदू का पहला-आखिरी फर्ज़ है।
पर तुम जैसे हैवानों को ये,
सच समझने में बड़ा हर्ज है।

नहीं चाहिए हमें धर्म की रक्षा,
करने वाला ऐसा 'हिन्दुत्ववादी'।
मेरी नजरों से देखो अगर तो इससे,
बड़ा नहीं है कोई 'आतंकवादी'।

उठो मेरे भाई-बहनों, उठ जाओं,
बरसों की गहरी नींद से जाग जाओ।
मिटा दो मिल कर ऐसे वहशियों को,
या फिर चुल्लू भर पानी में डूब जाओ।

इतना मेरे कहने पर भी, जानता हूँ,
तुम्हारे बहरें कानों पर जूँ न रेंगेगी।
फिर किसी लड़की को देख कर,
तुम्हारी हैवानियत आंखें सेकेंगी।

क्या करूँ समझ नहीं आता अब,
कहाँ जा कर के मुँह छिपाऊँ मैं।
अपने मर्द होने का, दुनियावालों,
कहाँ जा कर के मातम मनाऊँ मैं।

सच ही तो कह रहा हूँ मैं आज,
शर्म है मुझे, 'मर्द' मैं कहता हूँ।
मेरे जिस्म को पैदा करने वाली,
उसका जिस्म ही मैं नोंचता हूँ।

राम तुम मत लेना जन्म अब,
तुम्हारी यहाँ अब ज़रूरत नहीं।
परशुराम या नरसिंहा रूप की,
इससे कम अब ज़रूरत नहीं।

आना तुम फिर से अब 'रूद्र',
अवतार लेकर संहार करने को।
तुम्हारे नाम को बदनाम करें,
ऐसो के सर को काट कर के,
सबसे सही न्याय करने को।

ऐसो के सर को काट कर के,
सबसे सही न्याय करने को।

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इससे ज्यादा ना मैं कुछ कह सकता हूँ और ना मुझ में अब हिम्मत बची है। अगर तुम में अब इंसानियत थोड़ी सी भी बची है ना तो या तो कुछ करो या जा के डूब मरो।

अंजान 'इकराश़'

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